Tuesday, April 20, 2021

technique to produce transplantable livers in laboratory: वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में प्रत्यारोपण के लिए लिवर तैयार किया


हाइलाइट्स:

  • दुनियाभर में लिवर ट्रांसप्लांटेशन के लिए इंतजार कर रहे मरीजों के लिए वैज्ञानिकों ने विकसित की तकनीकी
  • अब मरीजों की कोशिकाओं से लैब में बनाया जाएगा लिवर, इंसानी शरीर नहीं कर पाएगा रिजेक्ट
  • ब्राजील के वैज्ञानिकों ने चूहे के लिवर का लैब में किया निर्माण, जल्द इंसानी अंगों को भी बनाया जाएगा

साओ पाउलो
लिवर की बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए वैज्ञानिकों ने नायाब इलाज खोजा है। अक्सर देखा जाता है कि लिवर के ट्रांसप्लांट को लेकर मरीजों को काफी दिक्कतें उठानी पड़ती है। शुरू में तो मरीजों को आसानी से लिवर मिलता ही नहीं है, अगर मिल भी जाए तो उन्हें ट्रांसप्लांट कराने के लिए लंबी वेटिंग लिस्ट का सामना करना पड़ता है। अब ब्राजील के साओ पाउलो इंस्टीट्यूट ऑफ बायोसाइंसेज के ह्यूमन जीनोम एंड स्टेम सेल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने लैब में लिवर का फिर से निर्माण करने और बनाने की तकनीक विकसित की है।

चूहे पर किया गया पहला प्रयोग
मेडिकल एक्सप्रेस डॉट कॉम की रिपोर्ट में बताया गया है कि वैज्ञानिकों ने प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट स्टडी चूहे के लिवर से की है। इस रिसर्च के अगले चरण में वैज्ञानिक प्रत्यारोपण के लिए इंसानों के लिवर का उत्पादन करने जा रहे हैं। मैटेरियल साइंस में प्रकाशित लेख में बताया गया है कि अगली योजना लैब में मानव लिवर को बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की है। इससे डोनर की तलाश कर रहे मरीजों की तकलीफें कम होंगी और ट्रांसप्लांटेड ऑर्गन के रिजेक्शन से भी बचा जा सकेगा।

इस तकनीकी पर आधारित है लिवर प्रोडक्शन
इस ऑर्टिकल को लिखने वाली लुइज़ कार्लोस डे केयर्स जूनियर ने बताया कि लिवर का उत्पादन डीसेल्यूलराइजेशन और रीसेल्यूलराइजेशन तकनीकी पर आधारित है। हाल के दिनों में टिशू बायोइंजीनियरिंग तकनीकों पर खूब काम हुआ है। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया में हम लैब में इंसान के लिवर के टिश्यू से सेल्स को अलग करने के लिए कई तरह के डिटर्जेंट और एंजाइम में धुलते हैं। इससे एक्स्ट्रासैल्यूलर मैट्रिक्स अलग हो जाते हैं और केवल मूल संरचना और बाहरी आकार ही बचता है। जिसके बाद एक्स्ट्रासैल्यूलर मैट्रिक्स को मरीज से ली गई सेल्स के साथ रखा जाता है। इससे ट्रांसप्लांटेशन के बाद मरीज का शरीर इस लीवर को रिजेक्ट नहीं कर पाता है।

इसलिए मरीज की शरीर नहीं कर पाएगा रिजेक्ट
HUG-CELL की प्रमुख खोजकर्ता मयाना ज़ेट्ज ने कहा कि इस तरह की तकनीक से ‘रिकंडिशन्ड लिवर’ को आसानी से ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। ऐसे ट्रांसप्लांटेशन के बाद अंग का रिजेक्शन रेट भी कम होता है, क्योंकि इसे मरीज की कोशिकाओं से ही बनाया गया होता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस तकनीकी से गैर-प्रत्यारोपण योग्य माने जाने वाले अंगों की मरम्मत भी की जा सकती है।

मरीजों के लिए वरदान बनेगी यह तकनीक
वैज्ञानिकों ने बताया कि कई बार ऐसी स्थिति आती है कि ट्रैफिक एक्सीडेंट में मरे लोगों के अंगों का प्रत्यारोपण नहीं किया जा सकता है। लेकिन, ऐसी तकनीकी से उन अंगों को प्रत्यारोपण के लिए सही किया जा सकता है। इस तकनीकी को मेडिकल साइंस के लिए वरदान माना जा रहा है क्योंकि दुनियाभर में लाखों लोग ऐसे हैं जो अलग-अलग अंगों के प्रत्यारोपण के लिए इंतजार कर रहे हैं।



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